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Surah Ar-Rahman (undefined)

سُورَةُ الرَّحۡمَٰن

Surah 55 of the Holy Quran · Medinan · 78 verses

Also spelled: Rahman, Ar Rahman, ArRahman, The Beneficent, Ar-Rehman, The Most Merciful

Surah Ar-Rahman (undefined) is the 55th chapter of the Holy Quran. It was revealed in Medina and contains 78 verses (ayahs). Read it below with the Arabic text, transliteration, and Hindi translation, or open it as interactive flashcards to memorize it verse by verse.

  1. 55:1

    ٱلرَّحْمَٰنُ

    Ar Rahmaan

    बड़ा मेहरबान (ख़ुदा)

  2. 55:2

    عَلَّمَ ٱلْقُرْءَانَ

    'Allamal Quran

    उसी ने क़ुरान की तालीम फरमाई

  3. 55:3

    خَلَقَ ٱلْإِنسَٰنَ

    Khalaqal insaan

    उसी ने इन्सान को पैदा किया

  4. 55:4

    عَلَّمَهُ ٱلْبَيَانَ

    'Allamalhul bayaan

    उसी ने उनको (अपना मतलब) बयान करना सिखाया

  5. 55:5

    ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ بِحُسْبَانٍۢ

    Ashshamsu walqamaru bihusbaan

    सूरज और चाँद एक मुक़र्रर हिसाब से चल रहे हैं

  6. 55:6

    وَٱلنَّجْمُ وَٱلشَّجَرُ يَسْجُدَانِ

    Wannajmu washshajaru yasjudan

    और बूटियाँ बेलें, और दरख्त (उसी को) सजदा करते हैं

  7. 55:7

    وَٱلسَّمَآءَ رَفَعَهَا وَوَضَعَ ٱلْمِيزَانَ

    Wassamaaa'a rafa'ahaa wa wada'al Meezan

    और उसी ने आसमान बुलन्द किया और तराजू (इन्साफ) को क़ायम किया

  8. 55:8

    أَلَّا تَطْغَوْا۟ فِى ٱلْمِيزَانِ

    Allaa tatghaw fil meezaan

    ताकि तुम लोग तराज़ू (से तौलने) में हद से तजाउज़ न करो

  9. 55:9

    وَأَقِيمُوا۟ ٱلْوَزْنَ بِٱلْقِسْطِ وَلَا تُخْسِرُوا۟ ٱلْمِيزَانَ

    Wa aqeemul wazna bilqisti wa laa tukhsirul meezaan

    और ईन्साफ के साथ ठीक तौलो और तौल कम न करो

  10. 55:10

    وَٱلْأَرْضَ وَضَعَهَا لِلْأَنَامِ

    Wal arda wada'ahaa lilanaame

    और उसी ने लोगों के नफे क़े लिए ज़मीन बनायी

  11. 55:11

    فِيهَا فَٰكِهَةٌۭ وَٱلنَّخْلُ ذَاتُ ٱلْأَكْمَامِ

    Feehaa faakihatunw wan nakhlu zaatul akmaam

    कि उसमें मेवे और खजूर के दरख्त हैं जिसके ख़ोशों में ग़िलाफ़ होते हैं

  12. 55:12

    وَٱلْحَبُّ ذُو ٱلْعَصْفِ وَٱلرَّيْحَانُ

    Walhabbu zul 'asfi war Raihaanu

    और अनाज जिसके साथ भुस होता है और ख़ुशबूदार फूल

  13. 55:13

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan

    तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगे

  14. 55:14

    خَلَقَ ٱلْإِنسَٰنَ مِن صَلْصَٰلٍۢ كَٱلْفَخَّارِ

    Khalaqal insaana min salsaalin kalfakhkhaari

    उसी ने इन्सान को ठीकरे की तरह खन खनाती हुई मिटटी से पैदा किया

  15. 55:15

    وَخَلَقَ ٱلْجَآنَّ مِن مَّارِجٍۢ مِّن نَّارٍۢ

    Wa khalaqal jaaan mim maarijim min naar

    और उसी ने जिन्नात को आग के शोले से पैदा किया

  16. 55:16

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan

    तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों से मुकरोगे

  17. 55:17

    رَبُّ ٱلْمَشْرِقَيْنِ وَرَبُّ ٱلْمَغْرِبَيْنِ

    Rabbul mashriqayni wa Rabbul maghribayni

    वही जाड़े गर्मी के दोनों मशरिकों का मालिक है और दोनों मग़रिबों का (भी) मालिक है

  18. 55:18

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan

    तो (ऐ जिनों) और (आदमियों) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

  19. 55:19

    مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ

    Marajal bahrayni yalta qiyaani

    उसी ने दरिया बहाए जो बाहम मिल जाते हैं

  20. 55:20

    بَيْنَهُمَا بَرْزَخٌۭ لَّا يَبْغِيَانِ

    Bainahumaa barzakhul laa yabghiyaan

    दो के दरमियान एक हद्दे फ़ासिल (आड़) है जिससे तजाउज़ नहीं कर सकते

  21. 55:21

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan

    तो (ऐ जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

  22. 55:22

    يَخْرُجُ مِنْهُمَا ٱللُّؤْلُؤُ وَٱلْمَرْجَانُ

    Yakhruju minhumal lu 'lu u wal marjaanu

    इन दोनों दरियाओं से मोती और मूँगे निकलते हैं

  23. 55:23

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan

    (तो जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत को न मानोगे

  24. 55:24

    وَلَهُ ٱلْجَوَارِ ٱلْمُنشَـَٔاتُ فِى ٱلْبَحْرِ كَٱلْأَعْلَٰمِ

    Wa lahul jawaaril mun sha'aatu fil bahri kal a'laam

    और जहाज़ जो दरिया में पहाड़ों की तरह ऊँचे खड़े रहते हैं उसी के हैं

  25. 55:25

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो (ऐ जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

  26. 55:26

    كُلُّ مَنْ عَلَيْهَا فَانٍۢ

    Kullu man 'alaihaa faan

    जो (मख़लूक) ज़मीन पर है सब फ़ना होने वाली है

  27. 55:27

    وَيَبْقَىٰ وَجْهُ رَبِّكَ ذُو ٱلْجَلَٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ

    Wa yabqaa wajhu rabbika zul jalaali wal ikraam

    और सिर्फ तुम्हारे परवरदिगार की ज़ात जो अज़मत और करामत वाली है बाक़ी रहेगी

  28. 55:28

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

  29. 55:29

    يَسْـَٔلُهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ كُلَّ يَوْمٍ هُوَ فِى شَأْنٍۢ

    Yas'aluhoo man fissamaawaati walard; kulla ywmin huwa fee shaan

    और जितने लोग सारे आसमान व ज़मीन में हैं (सब) उसी से माँगते हैं वह हर रोज़ (हर वक्त) मख़लूक के एक न एक काम में है

  30. 55:30

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे

  31. 55:31

    سَنَفْرُغُ لَكُمْ أَيُّهَ ٱلثَّقَلَانِ

    Sanafrughu lakum ayyuhas saqalaan

    (ऐ दोनों गिरोहों) हम अनक़रीब ही तुम्हारी तरफ मुतावज्जे होंगे

  32. 55:32

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे

  33. 55:33

    يَٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ إِنِ ٱسْتَطَعْتُمْ أَن تَنفُذُوا۟ مِنْ أَقْطَارِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ فَٱنفُذُوا۟ ۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلْطَٰنٍۢ

    Yaa ma'sharal jinni wal insi inis tata'tum an tanfuzoo min aqtaaris samaawaati wal ardi fanfuzoo; laa tanfuzoona illaa bisultaan

    ऐ गिरोह जिन व इन्स अगर तुममें क़ुदरत है कि आसमानों और ज़मीन के किनारों से (होकर कहीं) निकल (कर मौत या अज़ाब से भाग) सको तो निकल जाओ (मगर) तुम तो बग़ैर क़ूवत और ग़लबे के निकल ही नहीं सकते (हालॉ कि तुममें न क़ूवत है और न ही ग़लबा)

  34. 55:34

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

  35. 55:35

    يُرْسَلُ عَلَيْكُمَا شُوَاظٌۭ مِّن نَّارٍۢ وَنُحَاسٌۭ فَلَا تَنتَصِرَانِ

    Yursalu 'alaikumaa shuwaazum min naarifiw-wa nuhaasun falaa tantasiraan

    (गुनाहगार जिनों और आदमियों जहन्नुम में) तुम दोनो पर आग का सब्ज़ शोला और सियाह धुऑं छोड़ दिया जाएगा तो तुम दोनों (किस तरह) रोक नहीं सकोगे

  36. 55:36

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

  37. 55:37

    فَإِذَا ٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ وَرْدَةًۭ كَٱلدِّهَانِ

    Fa-izan shaqqatis samaaa'u fakaanat wardatan kaddihaan

    फिर जब आसमान फट कर (क़यामत में) तेल की तरह लाल हो जाऐगा

  38. 55:38

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे

  39. 55:39

    فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُسْـَٔلُ عَن ذَنۢبِهِۦٓ إِنسٌۭ وَلَا جَآنٌّۭ

    Fa-yawma'izil laa yus'alu 'an zambiheee insunw wa laa jaann

    तो उस दिन न तो किसी इन्सान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन से

  40. 55:40

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे

  41. 55:41

    يُعْرَفُ ٱلْمُجْرِمُونَ بِسِيمَٰهُمْ فَيُؤْخَذُ بِٱلنَّوَٰصِى وَٱلْأَقْدَامِ

    Yu'raful mujrimoona biseemaahum fa'yu'khazu binna waasi wal aqdaam

    गुनाहगार लोग तो अपने चेहरों ही से पहचान लिए जाएँगे तो पेशानी के पटटे और पाँव पकड़े (जहन्नुम में डाल दिये जाएँगे)

  42. 55:42

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    आख़िर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

  43. 55:43

    هَٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى يُكَذِّبُ بِهَا ٱلْمُجْرِمُونَ

    Haazihee jahannamul latee yukazzibu bihal mujrimoon

    (फिर उनसे कहा जाएगा) यही वह जहन्नुम है जिसे गुनाहगार लोग झुठलाया करते थे

  44. 55:44

    يَطُوفُونَ بَيْنَهَا وَبَيْنَ حَمِيمٍ ءَانٍۢ

    Yatoofoona bainahaa wa baina hameemim aan

    ये लोग दोज़ख़ और हद दरजा खौलते हुए पानी के दरमियान (बेक़रार दौड़ते) चक्कर लगाते फिरेंगे

  45. 55:45

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को न मानोगे

  46. 55:46

    وَلِمَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ جَنَّتَانِ

    Wa liman khaafa maqaama rabbihee jannataan

    और जो शख्स अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरता रहा उसके लिए दो दो बाग़ हैं

  47. 55:47

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे

  48. 55:48

    ذَوَاتَآ أَفْنَانٍۢ

    Zawaataaa afnaan

    दोनों बाग़ (दरख्तों की) टहनियों से हरे भरे (मेवों से लदे) हुए

  49. 55:49

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    फिर दोनों अपने सरपरस्त की किस किस नेअमतों को झुठलाओगे

  50. 55:50

    فِيهِمَا عَيْنَانِ تَجْرِيَانِ

    Feehimaa 'aynaani tajriyaan

    इन दोनों में दो चश्में जारी होंगें

  51. 55:51

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे

  52. 55:52

    فِيهِمَا مِن كُلِّ فَٰكِهَةٍۢ زَوْجَانِ

    Feehimaa min kulli faakihatin zawjaan

    इन दोनों बाग़ों में सब मेवे दो दो किस्म के होंगे

  53. 55:53

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

  54. 55:54

    مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ فُرُشٍۭ بَطَآئِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍۢ ۚ وَجَنَى ٱلْجَنَّتَيْنِ دَانٍۢ

    Muttaki'eena 'alaa furushim bataaa'inuhaa min istabraq; wajanal jannataini daan

    यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)

  55. 55:55

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे

  56. 55:56

    فِيهِنَّ قَٰصِرَٰتُ ٱلطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ

    Feehinna qaasiratut tarfi lam yatmishunna insun qablahum wa laa jaaann

    इसमें (पाक दामन ग़ैर की तरफ ऑंख उठा कर न देखने वाली औरतें होंगी जिनको उन से पहले न किसी इन्सान ने हाथ लगाया होगा) और जिन ने

  57. 55:57

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

  58. 55:58

    كَأَنَّهُنَّ ٱلْيَاقُوتُ وَٱلْمَرْجَانُ

    ka annahunnal yaaqootu wal marjaan

    (ऐसी हसीन) गोया वह (मुजस्सिम) याक़ूत व मूँगे हैं

  59. 55:59

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से मुकरोगे

  60. 55:60

    هَلْ جَزَآءُ ٱلْإِحْسَٰنِ إِلَّا ٱلْإِحْسَٰنُ

    Hal jazaaa'ul ihsaani illal ihsaan

    भला नेकी का बदला नेकी के सिवा कुछ और भी है

  61. 55:61

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

  62. 55:62

    وَمِن دُونِهِمَا جَنَّتَانِ

    Wa min doonihimaa jannataan

    उन दोनों बाग़ों के अलावा दो बाग़ और हैं

  63. 55:63

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

  64. 55:64

    مُدْهَآمَّتَانِ

    Mudhaaammataan

    दोनों निहायत गहरे सब्ज़ व शादाब

  65. 55:65

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की किन किन नेअमतों को न मानोगे

  66. 55:66

    فِيهِمَا عَيْنَانِ نَضَّاخَتَانِ

    Feehimaa 'aynaani nad daakhataan

    उन दोनों बाग़ों में दो चश्में जोश मारते होंगे

  67. 55:67

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे

  68. 55:68

    فِيهِمَا فَٰكِهَةٌۭ وَنَخْلٌۭ وَرُمَّانٌۭ

    Feehimaa faakihatunw wa nakhlunw wa rummaan

    उन दोनों में मेवें हैं खुरमें और अनार

  69. 55:69

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

  70. 55:70

    فِيهِنَّ خَيْرَٰتٌ حِسَانٌۭ

    Feehinna khairaatun hisaan

    उन बाग़ों में ख़ुश ख़ुल्क और ख़ूबसूरत औरतें होंगी

  71. 55:71

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

  72. 55:72

    حُورٌۭ مَّقْصُورَٰتٌۭ فِى ٱلْخِيَامِ

    Hoorum maqsooraatun fil khiyaam

    वह हूरें हैं जो ख़ेमों में छुपी बैठी हैं

  73. 55:73

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे

  74. 55:74

    لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ

    Lam yatmis hunna insun qablahum wa laa jaaann

    उनसे पहले उनको किसी इन्सान ने उनको छुआ तक नहीं और न जिन ने

  75. 55:75

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से मुकरोगे

  76. 55:76

    مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ رَفْرَفٍ خُضْرٍۢ وَعَبْقَرِىٍّ حِسَانٍۢ

    Muttaki'eena 'alaa rafratin khudrinw wa 'abqariyyin hisaan

    ये लोग सब्ज़ कालीनों और नफीस व हसीन मसनदों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे

  77. 55:77

    فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ

    Fabi ayyi aalaaa'i Rabbikumaa tukazzibaan.

    फिर तुम अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से इन्कार करोगे

  78. 55:78

    تَبَٰرَكَ ٱسْمُ رَبِّكَ ذِى ٱلْجَلَٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ

    Tabaarakasmu Rabbika Zil-Jalaali wal-Ikraam

    (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार जो साहिबे जलाल व करामत है उसी का नाम बड़ा बाबरकत है

About Surah Ar-Rahman

Ar-Rahman, the Most Merciful, is one of the most beautiful surahs in the Quran, with its refrain repeated thirty-one times: so which of the favors of your Lord will you deny. It lists gift after gift, from the sun and moon to the seas, the fruits, and the gardens of Paradise. It is a hymn of gratitude to the Most Merciful.

Themes: The favors of Allah, Gratitude, Creation and balance, Paradise

Arabic: Uthmani script (Hafs). Translation: Hindi. Recitation: Mishary Rashid Alafasy. See Sources for full attribution.